ख़्वाब

ख़्वाब तो हर कोई देखता है ख़्वाब देखने पर कोई टैक्स थोड़ी ना लगता है तो एक ख़्वाब हमने भी देखा तुम्हारा साथ होने का तुम्हारे साथ जीने का तुम्हारे साथ हंसने का तुम्हारे ही साथ रोने का हमने तो ये ख्वाब तक देखा कि दोनों मिलके कोई नया ख्वाब देखेंगे थोड़ा inception type है मगर ख्वाब तो ख्वाब है ख्वाब देखा एक आशियां बनाने का उसमे रहने का उसको सजाने का लेकिन कभी कभी मैं ये सोचता हूं कि क्या ख्वाब देखना जायज़ है? ये ख़्वाब ही तो होते है जो हमको वो सब करने पे मजबूर कर देते हैं. जिसे हम असंभव समझते हैं अगर ख़्वाब ना हो तो हो सकता है कि इस ब्रह्मांड की उत्क्रांति यानी कि evolution थम जाए ख्वाब ही तो हैं जो उत्क्रांति के बीज को जन्म देते हैं वर्ना मुमकिन है कि ये दुनिया एक से ढर्रे पे ही काबिज़ रहे ख्वाबों के बगैर इस सृष्टि की रचना की सोच भी नामुम्किन मालूम होती है मगर सवाल वही उठता है कि क्या ख़्वाब देखना जायज़ है? क्योंकि अधिकतर ख़्वाब पूरे नहीं होते वो टूट जाते हैं और बिखर कर कहीं खो से जाते हैं तो क्या ख्वाबों को नाजायज़ करार दिया जाये? बिलकुल भी नहीं बिना ख्वाबों के इंसान का जी पाना नामुम्किन है क्योंकि ख़्वाब ही तो है जो इंसान को उम्मीद देते हैं और एक उम्मीद ही तो वो ताकत है जो इंसान को ज़िंदा रखती है तभी तो कहते हैं कि उम्मीद पे दुनिया कायम है मगर मेरे हिसाब से तो ख्वाबों पे दुनिया कायम है।

अनुभव पांडे

Poetically by https://instagram.com/anubhav_writes?igshid=10clr1anlckaq